मंदिर के बाहर पैदा हुई थीं सीरियल 'रामायण' की मंथरा,अंबिका से ललिता बन खेली सबसे लंबी एक्टिंग पारी

घर-घर में 'रामायण' की मंथरा के नाम से पॉपुलर ललिता पवार 104वीं बर्थ एनिवर्सरी है। 18 अप्रैल 1916 को नासिक, महाराष्ट्र के येओला में जन्मी ललिता के नाम सबसे लंबी एक्टिंग पारी खेलने के रिकॉर्ड है। तब वे महज 9 साल की थी, जब उनके एक्टिंग करियर की शुरुआत हो चुकी थी। जब 1987 में रामानंद सागर की रामायण में मंथरा बनकर आईं, तब उन्हें काम करते हुए 62 साल हो गए थे। करीब 7 दशक तक एक्टिंग में अपना लोहा मनवाती रहीं ललिता का जन्म मंदिर के बाहर हुआ था और उनका नाम अंबिका रखा गया था। जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी ऐसी ही कुछ दिलचस्प बातें:-

अपनी ही फिल्म में नाम बदलकर रखा ललिता

ललिता पवार के पिता लक्ष्मणराव सगुन नासिक में अमीर बिजनेसमैन थे। कहा जाता है कि जब ललिता की मां प्रेग्नेंट थीं तब अंबा देवी के मंदिर गई हुई थीं वहीं पर उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और मंदिर के बाहर जन्म होने के कारण उनका नाम अंबिका रख दिया गया। एक बार अंबिका अपने पिता और भाई के साथ पुणे में एक फिल्म की शूटिंग देखने गईं, जहां निर्देशक नाना साहेब ने उनको देखा और बाल भूमिकाएं करने के लिए चुन लिया। पर ललिता के पिता इसके खिलाफ थे। हालांकि कई बार मनाने पर वे मान गए।

एक्शन फिल्मों में स्टंट करने वाली हीरोइन ललिता रामायण की मंथरा के रूप में मशहूर हुई थीं।

1928 में रिलीज हुई ‘राजा हरीशचंद्र’ से ललिता ने 9 वर्ष में उम्र में एक्टिंग कॅरिअर की शुरुआत की। हालांकि उनकी पहली फिल्म 1927 में आई ‘पतितोद्धार’ भी मानी जाती है। बाद में उन्होंने 1940 के दशक में कई साइलेंट फिल्मों में लीड रोल भी प्ले किया। कई फिल्मों में उनके नाम बदल-बदल कर रखे गए। फिर अपने बैनर तले बनी पहली फिल्म ‘दुनिया क्या है’ में उन्होंने अपना नाम ललिता रख लिया, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि अंबिका नाम फिल्म के लिए सही नहीं रहेगा और यह लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ेगा।

एक्शन सीन भी किए और स्विमिंग सूट भी पहना
उस दौर में इंडस्ट्री में थ्रिलर फिल्में प्रयोग के तौर पर बनाई जाती थीं। इनमें हीरोइनों से स्टंट करवाए जाते थे और ये उस वक्त के लिहाज से थोड़ी बोल्ड भी होती थीं। ललिता ने इस तरह की फिल्मों में भी काम किया। जैसे 1932 में आई ‘मस्तीखोर माशूक’ और ‘भवानी तलवार’, 1933 में आई ‘प्यारी कटार’ और ‘जलता जिगर’, 1935 में आई ‘कातिल कटार’ जैसे फिल्मों में उन्होंने एक्शन सीन भी किए। इसके साथ ही उनको माइथोलॉजिकल फिल्मों में भी काम खूब मिलने लगा था। हालांकि उन्हीं दिनों उन्होंने ‘दैवी खजाना’ फिल्म में स्विमिंग सूट भी पहना। ललिता ने उस दौर में कई तरह के टैबू ब्रेक किए।

शुरुआती दौर में फिल्मों में ललिता के नाम बदल-बदल कर रखे गए। पहली बार ललिता पवार का नाम ‘दुनिया क्या है’ में आया। जो उन्होंने ही बनाई थी।

बेहतरीन गायिका भी थीं
उस दौर में अभिनेत्रियों को अपने गाने खुद गाने पड़ते थे इसलिए ललिता ने बाकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। बुलंद आवाज की धनी होने के कारण उन्होंने कई फिल्मों में गाने गाए। 1935 में आई फिल्म ‘हिम्मते मर्दा’ ललिता की पहली बोलती फिल्म थी। इसी फिल्म में उन्होंने गीत भी गाया- ‘नील आभा में प्यारा गुलाब रहे, मेरे दिल में प्यारा गुलाब रहे...’ जो काफी लोकप्रिय हुआ था। इसके अलावा उन्होंने कई फिल्मों में अपने गाने खुद गाए।

लंबे कॅरियर के लिए गिनीज बुक में दर्ज हुआ नाम
भारतीय सिनेमा में सबसे लंबी पारी खेलने वाली महिला एक्टर के रूप में ललिता पवार का नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड की साइट पर दर्ज रिकॉर्ड की मानें तो हिंदी सिनेमा में उनकी सक्रियता सात दशक तक रही। इस दौरान उन्होंने 700 से ज्यादा पिक्चर में काम किया है। सात दशक के इस कॅरिअर में उन्होंने पॉजिटिव, नेगेटिव और ग्लैमरस समेत हर तरह के किरदार जीवंत किए हैं। बाद के वर्षाें में बतौर क्रूर सास उन्होंने इतने रोल किए कि आज भी सास की उपमा के लिए ललिता पवार का ही नाम लिया जाता है।

भगवान दादा का थप्पड़, फिर नही बनीं हीरोइन
ललिता मात्र 25 वर्ष की उम्र में कैरेक्टर रोल निभाने लगी थी। ऐसा एक दुखदपूर्ण घटना के कारण हुआ। इस घटना के बारे में खुद ललिता ने एक इंटरव्यू में बताया था, ‘चंद्र राव की एक फिल्म में मैं भगवान दादा के साथ काम कर रही थी। सीन कुछ यूं था कि हीरो को मुझे थप्पड़ मारना था और मुझे नीचे गिरना था। हुआ भी कुछ ऐसा ही। भगवान दादा ने मुझे थप्पड़ मारा और मैं नीचे गिर गई लेकिन इस दौरान मैं वाकई में बेहोश हो गई थी और मेरे कान में से खून निकलने लगा। दूसरे दिन मुझे पैरालिसिस हो गया और दाहिनी आंख सिकुड़ गई। इसके बाद मैं मुंबई वापस आ गई।

भगवान दादा का थप्पड़ पड़ने के बाद ललिता पवार दो साल तक बीमार रही थीं।

कुछ दिन बाद चंद्र राव का एक नोटिस मिला कि आप बीमार हो गई हैं जिसके चलते हमारा शूट रुका हुआ है। हम दूसरी लड़की को लेकर काम करने जा रहे हैं। यह बात अखबारों में आ गई जिसके बाद मेरे सारे कॉन्ट्रैक्ट कैंसल हो गए और मैं दो साल तक बीमार रही। हालांकि इस दौरान फिल्म ‘अमृत’ का जो मेरा कॉन्ट्रैक्ट था वह कैंसल नहीं हुआ। डायरेक्टर विनायकराव ने कहा कि हम आपके ठीक होने का इंतजार करेंगे पर ‘अमृत’ तो आपके बिना नहीं बनाई जाएगी। ढाई साल बाद मैं ठीक हुई तो ‘अमृत’ पर काम शुरू किया। फिल्म चली भी। उसके बाद मुझे कई औरफिल्में मिलने लगीं लेकिन हीरोइन के रोल नहीं मिले, मुझे कैरेक्टर रोल ही मिलते थे जो बाद में मेरी पहचान बन गए।'

लता मंगेशकर को दिए सोने के कुंडल
मायापुरी को 1975 में दिए इंटरव्यू में ललिता पवार ने एक बड़ी रोचक बात बताई थी, ‘बहुत पहले महाराष्ट्र में एक प्रोग्राम हुआ था। एक छोटी सी लड़की गाने के लिए बैठी। उसने इतना अच्छा गाया कि मैं खुद को भूल गई। मुझे गुस्सा आया कि इस लड़की को कोई इनाम क्यों नहीं मिल रहा है। मैं खड़ी हुई और कह दिया कि मेरी तरफ से इस लड़की को सोने का मैडल इनाम दिया जाए, लेकिन फिर मुझे होश आया कि मैं सोने का मैडल लेकर कहां आई हूं तो चुपचाप मैं अपनी जगह बैठ गई। बाद में मैंने सोने के कुंडल बनवाए और कोल्हापुर जाकर उस लड़की को दिए। उस लड़की का नाम लता मंगेशकर था।’



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बतौर बाल कलाकार ललिता पवार ने मूक फिल्म ‘पतितोद्धार’ में काम किया। इसके लिए उन्हें 18 रुपए मासिक सैलरी मिलती थी।


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