प्रसिद्ध गीतकार शकील आजमी ने भास्कर के लिए लिखीं खास पंक्तियां- 'माँ के कदमों तले जन्नत है सुना था मैंने'
थप्पड़, आर्टिकल-15, मुल्क और तुम बिन 2 जैसी फिल्मों के लिए गीत लिख चुके शकील आजमी ने मदर्स डे के मौके पर कुछ पंक्तियां खासतौर पर दैनिक भास्कर के लिए लिखी हैं। जिनके माध्यम से उन्होंने मां का महत्व बताने की कोशिश की है।
शकील आजमी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के सहरिया के रहने वाले हैं। बॉलीवुड में काम करते हुए उन्हें करीब 13 साल हो चुके हैं। वे फिल्मों में गीत लिखने के अलावा शायरी और गजल लिखने के मामले में भी काफी प्रसिद्ध हैं।
'मदर्स डे'पर शकील की पंक्तियां...
माँ के क़दमों तले जन्नत है सुना था मैंने
और जब समझा तो जन्नत से ज़ियादा कुछ था
- शकील आज़मी
गुज़रता है मेरा हर दिन मगर पूरा नहीं होता
मैं चलता जा रहा हूँ और सफर पूरा नहीं होता
ख़ुदा भी ख़ूब है,भगवान की मूरत भी सुन्दर है
मगर जब माँ नहीं होती तो घर पूरा नहीं होता
- शकील आज़मी
माँ की याद
शह्र सारा मुझे लगने लगा आंगन मेरा
माँ की याद आई तो याद आया है बचपन मेरा
कोई कहने लगा परियों की कहानी फिर से
फिर से शहज़ादों के मानिन्द हुआ मन मेरा
फिर वही मैं, वही तितली, वही जुगनू का समां
वही सावन की फुहारें, वही कोयल की सदा
वही सर्दी, वही गर्मी, वही बरसात की रुत
वही सुबहें, वही शामें, वही रातें, वही दिन
वही शहतूत, वही नीम, वही आम के पेड़
वही अमरूद, पपीते, वही जामुन के दरख्त
वही टपके हुए महुवे, वही इमली की खटास
वही खेतों से चुराए हुए गन्ने की मिठास
वही पोखर में सिंघाड़े, वही मछली का शिकार
वही चलती हुई रेहटें, वही फसलों पे बहार
वही तख्ती, वही बस्ता, वही स्कूल के यार
वही खेलों से मोहब्बत, वही पढ़ने से फरार
भर गया रंग से एहसास का दरपन मेरा
माँ की याद आई तो याद आया है बचपन मेरा
- शकील आज़मी (नज़्म: पोखर में सिंघाड़े)
इमली के नीचे का रस्ता
इमली के फूलों से सजकर
सुबह सवेरे यूँ लगता है
जैसे दुपट्टा हो अम्मां का
कल सो कर जल्दी उठूंगा
लोगों के चलने से पहले
इमली के सारे फूलों को
डलिया में चुन कर रखूंगा
फिर अम्मां की क़ब्र पे जा कर
इन फूलों को रख आऊंगा
अम्मां नया दुपट्टा ओढ़े
मेरे खवाबों में आएगी
- शकील आज़मी (नज़्म: इमली के फूल)
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