विज्ञान की रहस्यमयी कहानी पर बनी है अभय देओल की 'जेएल50' सीरीज, आ सकता है दूसरा सीजन

अ‍भय देओल की मिनी सीरिज 35 साल पहले उड़ान भरे ‘जेएल50’ विमान की कहानी है। अचानक साल 2019 में वह आता है और क्रैश हो जाता है। यह कहानी मौजूदा कालखंड में एक और उड़ान भरे विमान ‘एओ26’ की कहानी भी है, जो अचानक गायब हो गया है। आसमान उसे निगल गया है।

ऐसी है सीरीज की कहानी

सीबीआई अफसर शांतनु ‘एओ26’ की खोज में बंगाल से सटे इंडिया चीन की सीमावर्ती इलाकों में पहुंचता है। साइट पर पता चलता है कि मलबा ‘एओ26’ नहीं ‘जेएल50’ का है, जो 35 साल पहले हाईजैक किया गया था। हालांकि उस विमान से दो सर्वाइवर हैं। पायलट बिहू और प्रोफेसर मित्रा। दोनों जस के तस हैं, जैसे 35 साल पहले थे। हाईजैक के तार आजाद बांग्‍ला संगठन से हैं, जो बंगाल को भारत से अलग करना चाहते हैं।

निर्देशक शैलेंद्र व्‍यास ने चार एपिसोड की एक मिनी सीरीज बनाई है। इसमें उन्‍होंने ट्राइम ट्रेवलिंग को केंद्र में रख अतीत के प्‍लेन हाईजैक को रोकने के मिशन की कहानी कही है। उन्‍होंने शांतनु, बिहू, प्रोफेसर मित्रा, प्रोफसर सुब्रतो दास के अतीत का सवाल भी गुजरे हुए कल से देने की कोशिश की है। यह मिनी सीरीज उस मूलभूत सोच पर आधारित है, जो कहती है ‘समय हर सवाल का जवाब है’। चाहे वह समय गुजरे हुए कल का हो या आने वाले कल का। समय विज्ञान भी है, आध्‍यात्‍म भी है। यह चमत्‍कार भी है। यह व्‍याख्‍यान भी है।

दर्शकों को स्क्रीन से जोड़कर रखेगी सीरीज

शैलेंद्र व्‍यास ने इसे बहुत हद तक रहस्‍यमयी और रोमांचक बनाने में सफलता हासिल की है। घटनाक्रम विज्ञान के चमत्‍कार और आजादी की प्रबल इच्‍छा के बीच मनोरंजक सफर तय करता है। यह स्‍क्रीनप्‍ले वाली मिनी सीरीज है। परत दर परत जिस कदर किरदारों के राज खुलते हैं, वो दर्शकों में उत्‍सुकता का आलम बनाए रखते हैं।

इस तकरीबन सधी हुई रहस्‍य गाथा में विज्ञान फंतासी का छौंका है। धरती पर पाए जाने वाले वॉर्म होल्‍स की सरल व्‍याख्‍या है, जिसके जरिए ऐसे अनुमान हैं कि कोई समय में सफर कर सकता है। शैलेंद्र व्‍यास ने रहस्‍यमयी समय के कालखंड की तरह अपने किरदारों को भी गढ़ा है।

बन सकता है जेएल-50 का दूसरा सीजन

शांतनु, बिहू, मित्रा, बोस सब ढूंढ रहे हैं कुछ। उस खोज को अभय देओल, रितिका आनंद, पीयूष मिश्रा और पंकज कपूर ने मूर्त रूप प्रदान किया है। किरदारों को जीते वक्‍त अभय देओल और रितिका की ऊर्जा जरूर जरा कम लगती है। पंकज कपूर सरप्राइज कर ही रहे होते हैं कि यह मिनी सीरीज समाप्ति की दहलीज पर पहुंच जाती है। आखिरी एपिसोड में हालांकि एक क्‍लू है, जिससे इसके दूसरे सीजन के आने की संभावना है। उस सवाल का जवाब मिलना मुमकिन है कि आखिर शांतनु और बिहू अतीत से वापस कैसे आए।

‘जेएल50’ प्रयोगवादी थ्रिलर है। सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर बनी है। इस तरह की नैरेटिव वाली कहानियों को बढ़ावा मिलना चाहिए। प्रतिभावान लोग इससे जुड़े हुए हैं। सिनेमैटोग्राफर ब्रैडली जे स्‍टक्‍ल ने इसे विजुअली खूबसूरत बनाया है। शैलेंद्र व्‍यास खुद एडिटिंग पर भी हैं। सुशांत मिश्रा के साथ मिलकर इसकी ‘कटाई छंटाई’ करीने से की है। आखिर में जो प्रोफेसर बोस का संवाद है, ‘हर चमत्‍कार को सिर्फ नमस्‍कार किया जाता है, उस पर सवाल क्‍यों नहीं होते कि वह हुआ कैसे’ की तरह इस सीरीज पर भी केस स्‍टडी हो सकती है कि आखिर यह इतना इनो‍वेटिव यानी अभिनव बना कैसे?



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JL50 series review: Abhay Deol's JL 50 series is based on the mysterious story of science,


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