अमित मलिक के वायोलिन वादन के साथ शुरू हुआ विश्वरंग फिल्म फेस्टिवल का दूसरा दिन

भोपाल नवंबर 24. विश्वरंग फिल्म फेस्टिवल 2020 का दूसरा दिन अमित मलिक के वायोलिन वादन के साथ शुरू हुआ। दिन के पहले सत्र का संचालन विनय उपाध्याय और ज्योति दुबे ने किया। इस सत्र में फिल्म और संगीत जगत के उभरते सितारे अमित मलिक ने अपने शानदार वायोलिन वादन से सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अमित मलिक के वायोलिन वादन के बाद उमा वासुदेव द्वारा निर्देशित फिल्म पद्मा सचदेव की प्रस्तुति की गई। यह फिल्म आधुनिक डोगरी कविताओं पर आधारित है। इसके बाद आबिद सिद्दिकी के निर्देशन में बनी शहरयार फिल्म का प्रदर्शन हुआ। यह फिल्म भारतीय गीतकार ए.के.एम. शहरयार के जीवन पर आधारित है।

फिल्म फेस्टिवल में दूसरे दिन साइंस फिल्म "नागालैंड इज चेंजिंग" का प्रदर्शन भी किया गया। इस फिल्म का निर्देशन गुरमीत सपाल ने किया है, जिसमें नागालैंड के स्थानीय लोगों और जंगलों के बीच के रिश्ते को समझाने की कोशिश की गई है। कार्यक्रम में आगे कई शॉर्ट फिल्मों का प्रदर्शन भी किया गया। सत्र के दौरान विनय उपाध्याय ने बताया कि अब शॉर्ट फिल्मों की तरफ भी लोगों की रुचि बढ़ रही है और विश्वंरग फिल्म फेस्टिवल 2020 में शामिल होने के लिए देश विदेश से ढेरों फिल्मों आई थी। इनमें से सबसे बेहतरीन फिल्मों का चुनाव करना काफी मुश्किल काम था।पहली शॉर्ट फिल्म जरी वाला आसमान का निर्देशन आसिफ मोयल ने किया था। यह फिल्म एक गरीब मुस्लिम मजदूर के जीवन पर आधारित है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक शांतिपूर्ण शहर में रहने वाले मुस्लिम मजदूर के जीवन में सांप्रदायिक अशांति से कितनी मुश्किलें आती हैं और एक सामान्य से गरीब इंसान का जीवन कितना मुश्किल हो जाता है। इसके बाद एंटी हीरो फिल्म की प्रस्तुति हुई। इस शॉर्ट फिल्म में एक चींटी और एंटीलियन लार्वा की कहानी दिखाई गई है। फिल्म का निर्देशन सिद्धू दास ने किया है।

फिल्म फेस्टिवल में आखिरी शॉर्ट फिल्म रुखसाना रही, जिसका निर्देशन मोहम्मद जॉर्जिस ने किया है। फिल्म में रुखसाना नाम की एक लड़की की कहानी दिखाई गई है, जो अपने कॉलेज की परीक्षा देकर जीवन में आगे बढ़ना चाहती है, पर कई तरह की मुश्किलें उसके सामने आती हैं। कार्यक्रम के अंत में विशेष रूप से आमंत्रित फिल्म "पेंटिंग लाइफ" का प्रदर्शन हुआ। 2018 में बनी इस फिल्म का निर्देशन डॉ. बीजू ने किया है।

फिल्म महोत्सव के दूसरे दिन के अंत में कुर्दिश फिल्म "जेर" के निर्देशक काजिम ओज के साथ सुदीप सोहनी ने विशेष बातचीत की इश सत्र का संचालन शर्बानी ने किया। “जेर” एक गाने की कहानी है, जिसमें फिल्म के नायक की दादी की यादें और पहचान छिपी हुई है। फिल्म के नायक जेन को उसकी दादी मरने से पहले एक गीत सुनाती हैं। इस गीत में नरसंहार से जुड़ी यादें और दादी का अतीत छिपा हुआ है। नायक की दादी ने अपने जीवन में एक बड़ा नरसंहार देखा था और उस दौर में वो किसी तरह खुद को जिंदा रख पाने में कामयाब हुई थी।

दिन के अंत में मास्टर क्लास कार्यक्रम में युवा लेखक और फिल्म निर्देशक मोहित प्रियदर्शी ने जाने माने मलयालम फिल्म निर्देशक डॉ. बीजूकुमार दामोदरन के साथ बातचीत की। इस दौरान उन्होंने बताया कि फिल्म बनाने में क्या मजा है और कैसे एक स्वतंत्र फिल्म निर्देशक ज्यादा खुलकर ज्यादा बेहतर तरीके से फिल्म का निर्माण कर सकता है। दिन के आखिरी सत्र में पिछले संस्करण से जुड़ी यादें भी साझा की गई, जिसमें अभिनेता आशुतोष राणा शामिल हुए थे। इस सत्र में उन्होंने अपनी पहली किताब 'मौन मुस्कान की मार' के बारे में बातचीत की थी। उनकी पहली किताब 'मौन मुस्कान की मार' हास्य व्यंग्यों का एक संग्रह है। उन्होंने बताया था कि उनकी किताब मैथिलीशरण गुप्त की कविता "चारु चंद की चंचल किरणे" से प्रेरित थी। इस दौरान उन्होंने एक साइकिल हादसे का मजेदार किस्सा भी सुनाया था।

बाल साहित्य, कला एवं संगीत महोत्सव के कार्यक्रम वर्ली आर्ट वर्कशॉप के साथ शुरू हुआ विश्वरंग बाल साहित्य, कला और संगीत महोत्सव का तीसरा दिन सलोमी पारेख गांधी ने बताई वर्ली आर्ट की बारीकियां महाराष्ट्र के आदिवासियों की प्रचलित कला है वर्ली आर्ट.

देश के प्रसिद्ध पेरेंटिंग यू ट्यूब चैनल गेट सेट पेरेंट विद पल्लवी द्वारा विश्व रंग 2020 के अंतर्गत आयोजित पहले बाल साहित्य, कला और संगीत महोत्सव के तीसरे दिन की शुरुआत आर्ट वर्कशाॉप के साथ हुई। पल्लवी राव चतुर्वेदी ने इस सत्र में सलोमी पारेख गांधी के साथ बातचीत की। यह वर्कशॉप "वर्ली आर्ट" पर आधारित थी। वर्ली आर्ट एक ट्राइबल आर्ट है जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र में पाई जाती है और इसका उदय भी यहीं हुआ था। विश्वरंग बाल साहित्य, कला और संगीत महोत्सव के जरिए इस कला के इस रूप को वैश्विक पहचान मिल रही है।

वर्कशॉप की शुरुआत में सलोमी पारेख ने वर्ली आर्ट के बारे में बताया और इससे जुड़ी कई रोचक जानकारियां साझा की। इस पेंटिंग को बनाने के लिए पहले कई गोले, आयत और वर्गाकार आकृतियां बनाई जाती हैं, जिनके जरिए आदिवासियों के आम जीवन को दर्शाया जाता है। यह पेंटिंग घर की दीवारों पर खास मौकों पर बनाई जाती थी। वर्ली आर्ट के लिए भूरा रंग गोबर और मिट्टी को मिलाकर बनाया जाता था, जबकि सफेद रंग चावल, गोंद और पानी मिलाकर बनाया जाता था।

वर्ली आर्ट का सबसे प्रचलित रूप एक संकेतिक भाषा में है। जिसमें लोगों को रोजमर्रा के काम करते दिखाया जाता है। वर्ली आर्ट का यह रूप एक मान्यता पर आधारित है, जिसमें जीवन को एक सफर के रूप में दिखाया जाता है, जिसकी कोई आदि और अंत नहीं है। वर्कशॉप में सलोमी ने एक बच्ची को वर्ली आर्ट बनाना भी सिखाया। बदलते समय के साथ वर्ली आर्ट बनाने के तरीके में भी काफी बदलाव आया है और अब लोग गोबर और चावल से बने रंगों की बजाय कृत्रिम चीजों का इस्तेमाल करते हैं। कार्यक्रम के अंत में सलोमी ने क्रियोनी, स्केचिंग और कई चीजें चिपकाकर एक शानदार वर्ली आर्ट बनाई।विश्वरंग बाल साहित्य, कला और संगीत महोत्सव में तीसरे दिन प्रतीक धुर्वा ने सुनाई रोचक कहानियां कृष्ण और कालिया नाग की कहानी बनी स्टोरी टेलिंग सेशन का मुख्य आकर्षण कहानी के अंत में बच्चों से पांच सवाल पूछे, आर्ट और क्राफ्ट बनाना भी सिखाया.



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Second day of Vishwarang Film Festival begins with Amit Malik's violin playing


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